Friday, April 5, 2013

पर उपदेश कुशल बहुतेरे !!!!

कल भारतीय उद्योगपतियों को संबोधित करने का अवसर हमारे राहुल गांधी को मिला ! किस हक से भगवान् जाने ..............प्रधानमन्त्री पद का उम्मीदवार वो खुद को मानते नहीं ,प्रशासनिक अनुभव कोई है नहीं क्यूंकि वो जिम्मेदारी लेने से डरते है, ले दे कर बचता है संगठनात्मक (असफलता ) का अनुभव है ............................शायद सी आई आई के पदाधिकारी उसी अनुभव को साझा करना चाहते हो ...खैर उन्होंने कुछ बाते कही और उन बातो पर चर्चा होनी चाहिए ......

उन्होंने भारतीय पिछड़ेपन का एक कारण भारतीय लोकतंत्र बताया और कहा की 5 0 0 लोग मिलकर पुरे देश के भविष्य को निर्धारित करते है . अब ये तो उन्हें  शायद पता नही की जिन जनप्रतिनिधियों की बात कर रहे उन्हें जनता ही चुनती है वो कही आसमान से नहीं टपकते है और हां उसमे कुछ कमिया  भी है ,तभी सिर्फ एक परिवार से सम्बंधित होने कारण वो उस बैठक को संबोधित कर रहे थे लेकिन वो कमी संख्या  नहीं ये तय है बल्कि उनके चुने जाने के तरीको से हो सकता है .1 2 0 करोड़ लोगो को स्वो सीधे निति निर्धारण प्रक्रिया में लाना चाहते है लेकिन किस प्रकार से इसमें उनका ज्ञानी मस्तिष्क  योगदान देने में असमर्थ  है .

उन्होंने प्रधानो को अधिकार सम्पन्न बनाने की बात की(प्रधानमंत्री को अधिकार संपन्न बनाने पर मौन रहे ) लेकिन  किस प्रकार से,फिर  इसमें उनका ज्ञानी मस्तिष्क  योगदान देने में असमर्थ  है .

गरीबी घटाने की बात कर रहे है लेकिन किस प्रकार से ,फिर  इसमें उनका ज्ञानी  मस्तिष्क  योगदान देने में असमर्थ  है (शायद मोंटेक को वे गरीबी निर्धारण आय को 2 2  रुपये से घटाकर  1 0 रुपये  कर देने को कहे ,  ).वो ये भूल गए की पिछल 5 6  सालो से अगर गरीब देश में बने हुए है तो इसमें सर्वाधिक सम्मानित योगदान किसका है .यहाँ तक कि श्रीमती इंदिरा गाँधी गरबी हटाओ नारे के बल पर ही सत्ता में आई थी आज   4 2 साल बाद भी उनका नाती भी उसी नारे को भुनाने की कॉशिश कर रहा है।

 विकास समावेशी होना चाहिए और  धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के आधार  पर होना चाहिए (निशाना किसकी तरफ था सब जानते है ) अच्छी बात है  लेकिन क्या कुछ सवालों का जवाब हाई आपके पास ,कि  1 9 8 4  का सिख नरसंहार किस धर्मनिरपेक्षता की निशानी था ,कि मेरठ ,मलियाना ,भागलपुर के दंगे किस धर्मनिरपेक्षता की निशानी थे ,कि  वहां धर्मनिरपेक्षता के मापदंड  ही दुसरे   थे .दुसरो पर सवाल उठा रहे हो आप और खुद की गिरेबान में झांकने का वक़्त नहीं मिला .एक बार अपने पिता की उस  अमर पंक्ति को याद ही  कर लिया होता कि बड़ा पेड गिरता है तो धरती हिलती ही है (चौरासी  के दंगो के वक़्त )

विश्वविद्यालयों का सम्बन्ध उद्योगों से जोड़ना होगा .......................किसने रोका था आपको सम्बन्ध जोड़ने से .....पिछले नौ सालो से आपकी सरकार है केंद्र में जो की आपके एक पत्र पर दंडवत हो जाती है .क्या आप उन्हें फिर एक पाती नहीं दे सकते थे या फिर आपके पास सुझाव देने लायक कुछ  था ही नहीं  .  

कहा जाता है पहली बार इन्होने इस तरह का बिना पढ़े हुए भाषद दिया .4 2 साल की उम्र में किसी और व्यक्ति की लिए तो यह कतई उपलब्धि नहीं थी ,राहुल गाँधी के लिए निश्चय ही है ,भले वो सवालों का जवाब देने से बचते नजर आये हो .माननीय गांधीजी कोई घोड़े पर सवार आदमी का इन्तेजार नही कर रहा (शायद आप कर रहे हो ).और अगर आप वास्तव में लोकतंत्र में सुधार की सोच रखते तो सबसे पहले खुद का आत्मावलोकन करते आप इस पद पर किस तरह पहुचे है और क्या आम कांग्रेसी इस  पद पर आपकी तरह पहुच सकता है ,यदि नहीं ,तो आपको कोई नैतिक हक नहीं है इस तरह के उपदेश देने का .......

2 comments:

तर्कश said...

BAHUT ACHCHA RAHUL SOCHA TO MAINE BHI PAR LIKH NAHI SAKA SO DHANYAWAAD

भड़ास !!!! said...

@kaanunchi....agar mai galat nahi hoo to aap shaayad muraari bhai saahab hai!